गाँव के एक वीरान स्कूल में, जहाँ श्यामपट्ट पर धूल जम चुकी है, एक बूढ़ा मास्टर अब भी उम्मीद लिख रहा है।
पर सवाल वही है —
क्या अक्षर पेट भर सकते हैं?
सुबह की पहली धूप जब गाँव के उस पुराने स्कूल की टूटी खिड़कियों में से भीतर दाख़िल होती है, तो कमरे में धूल ऐसे उड़ती है मानो हवा भी किसी भूले हुए वक़्त और उसकी धुंधली धूल से लिपटी यादों को जगाने की कोशिश कर रही हों। कमरा बिल्कुल शांत था, इतना शांत कि अगर कोई चिड़िया खिड़की के जंग लगे फ्रेम में बैठ जाये तो उसके पंखों के फड़फड़ाने की आवाज़ पूरे कमरे में सुनाई दे। दीवारों पर चूने की परतें ऐसे झड़ चुकी थी जैसे वक़्त ने उन पर अपने नाखून घिस दिए हों । फ़र्श पर पड़े छत के छितरे, टूटी बेंचों के टुकड़े और मकड़ी के जालों में फँसी धूल सब कुछ बस एक ही बात कह रहे थे :- “यहाँ कभी कोई था… अब कोई नहीं।” पर बीचों- बीच दीवार पर टंगा था — एक पुराना काला श्यामपट्ट। उसकी सतह पर सफेद चाक की महीन रेखाएँ अब भी चिपकी थीं — जैसे कोई स्मृति जान नहीं छोड़ रही। वह बोर्ड अपनी ख़ामोशी में ऐसे खड़ा था जैसे उसे अभी भी विश्वास हो कि बच्चे लौटेंगे।
दरवाज़े पर चाभियों की खनक सुनाई दी। मास्टर रामदयाल कमरे में दाख़िल हुए। धीरे-धीरे, जैसे कोई मंदिर में प्रवेश करता है। उनके कदमों के नीचे धूल उठी और कमरे की निःशब्द हवा में एक हलचल-सी हुई। कमर में चाभियों का गुच्छा अब भी लटका था — कई ताले, कई चाभियाँ, पर अब किसी दरवाज़े को खोलने की ज़रूरत नहीं रही थी। फिर भी वे रोज़ यही करते थे — ताला छूते, उसे बजाते, और कमरे में आते ही श्यामपट्ट के सामने खड़े हो जाते। कुछ देर तक उसे यूँ ही देखते जैसे किसी बहुत पुराने दोस्त की आँखों में झाँक रहे हों। फिर बिना कुछ बोले लौट जाते, उनके चेहरे पर भूख की रेखाएँ थीं — वे रेखाएँ जिन्हें उम्र नहीं बनाती, जिन्हें हालात गढ़ते हैं। उनकी आँखों में वह चमक अब नहीं थी जो कभी बच्चों की कविता सुनाते समय होती थी। अब उनमें एक ठंडी थकान थी जैसे कोई दीपक बुझने के बाद भी थोड़ी देर लाल अंगारों में जल रहा हो। स्कूल के बाहर चायवाला अपना ठेला लगाए बैठा था। मास्टर को हर सुबह आता देख कहता —
“मास्टर जी, अब कौन पढ़ेगा यहाँ?”
मास्टर रामदयाल मुस्कुराते और बहुत धीरे से कहते —
“बच्चे तो हैं…
बस स्कूल नहीं है।”
चायवाला हँसकर कह देता —
“सब शहर चले गए हैं, मास्टर जी।
काम करने और पेट पालने।”
मास्टर जी जवाब में बस सिर झुका लेते और उनकी मुस्कान में एक अजीब-सी हामी होती, जैसे वे अपनी हार को भी गरिमा से पहन रहे हों।
उस दिन वे कमरे में ज़्यादा देर रुके। श्यामपट्ट के पास गए, डिब्बी में रखी आधी टूटी खड़िया उठाई और धीरे से लिखा — “ज्ञान की रोशनी बुझी नहीं, बस किसी ने बत्ती निकाल ली है।” खड़िया की रेखा काँप रही थी, जैसे अक्षर भी रो रहे हों। वे खड़े रहे, लंबे समय तक खड़े रहे — फिर अचानक हवा का झोंका आया, और शब्द थोड़ा धुँधला हो गया। उन्होंने आँखें बंद कीं और फुसफुसाए — “क्या सचमुच कोई लौटकर नहीं आएगा?” कमरा चुप रहा, बस चिड़िया का पंख फड़का और श्यामपट्ट पर एक हल्की सफ़ेद लकीर तिरछी बन गई। बाहर से आवाज़ आई — “मास्टर जी!” वे मुड़े, दरवाज़े पर शफी खड़ा था, उनका पुराना छात्र, अब जवान आदमी —चेहरे पर शहर की परतें, आँखों में थकान और हकीकत का बोझ। उसने सिगरेट के धुएँ के बीच कहा —
“मास्टर जी, ये सब छोड़ दीजिए।
पढ़ाई से रोटी नहीं मिलती।
शहर चलिए, काम करा दूँगा।”
रामदयाल शांति से बोले —
“शफी, जो हाथ कलम पकड़ने को बने हैं,
उन्हें हथौड़ा उठाते नहीं देख सकता।”
शफी हँसकर बोला —
“तो भूख क्या पकड़ लेगी, मास्टर जी?”
सवाल हवा में ठहर गया। श्यामपट्ट पर लिखे शब्द काँप उठे।
मास्टर ने बस इतना कहा —
“भूख से बड़ा दर्द है —
ज्ञान का मर जाना।”
शफी चुप हो गया। कहीं भीतर कुछ टूट गया था और उसी पल बाहर से एक पतली-सी आवाज़ आई —
“मास्टर जी… मुझे ‘राम’ लिखना सिखाओगे?”
दरवाज़े पर एक छोटा लड़का खड़ा था — फटे कपड़ों में, नंगे पाँव पर आँखों में उम्मीद के दो चमकीले दिए। छोटे लड़के की आवाज़ सुनकर मास्टर रामदयाल ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, और उस बच्चे की ओर देखा, जो दरवाज़े पर खड़ा अपने फटे शर्ट के कोने को मरोड़ रहा था जैसे डर और उम्मीद दोनों उससे लिपटे हों। बच्चे की आँखों में वह चमक थी जो अक्सर उन आँखों में होती है जिन्होंने ज़िन्दगी से ज़्यादा भूख देखी हो, पर फिर भी सपने देखना छोड़ा न हो।
मास्टर ने धीमी मुस्कान से पूछा—
“नाम क्या है तुम्हारा?”
बच्चा बोला—
“बबलू।”
आवाज़ काँप रही थी, पर भीतर इच्छा की लौ तेज़ थी। मास्टर ने हाथ के इशारे से उसे अंदर बुलाया—
“आओ। यहाँ बैठो।”
बबलू ने बोर्ड की ओर देखा, जहाँ धुँधले अक्षरों में अब भी लिखा था—
“ज्ञान की रोशनी बुझी नहीं…”
वह खामोश खड़ा रहा, जैसे कोई मंदिर में पहली बार प्रवेश करने वाला भक्त देवता की प्रतिमा को देखता है। मास्टर ने चाक उठाई और वह बेहद हल्की-सी आवाज़ में खड़खड़ाई, जैसे बूढ़े पेड़ की शाख हवा में काँप जाए।
उन्होंने बोर्ड पर एक बड़ा, गोल, साधारण-सा अक्षर बनाया—
“र”
बबलू ने आँखें फैलाकर पूछा—
“ये क्या है, मास्टर जी?”
रामदयाल ने उसकी ओर झुककर कहा—
“ये ‘र’ है, बबलू…
और ‘र’ से शुरू होता है— राम।”
बबलू ने चुपचाप वही अक्षर उँगली से हवा में दोहराया और फिर बोला—
“अच्छा… अब ‘राम’ पूरा लिखिए।”
मास्टर ने अगला अक्षर बनाया— “ा” फिर— “म”
बोर्ड पर अब साफ़-साफ़ लिखा था— राम
कमरे में अचानक एक ऐसी शांति फैल गई जैसे इन चार अक्षरों ने सारे टूटे शीशे और धूल भरी बेंचों को जागा दिया हो। बबलू धीरे से मुस्कुराया— जैसे किसी ने उसे पहली बार उसका अपना चेहरा दिखा दिया हो। फिर उसने उत्साहित होकर कहा—
“अब ‘सीता’ भी लिखो, मास्टर जी!”
रामदयाल ने उसी चमकती नज़र के साथ लिखा— सीता
कमरा थोड़ी देर के लिए फिर चमक उठा— जैसे दोनों नाम सिर्फ़ शब्द न थे, बल्कि इस निर्जन कमरे में वापसी की घंटी थे। बबलू ने हँसते हुए कहा—
“अब लिखो— राम-सीता भाग गए!”
मास्टर भी हँस पड़े। उनकी हँसी में सालों बाद जलती हुई एक रोशनी थी। ऐसा लगा जैसे दीवारें भी मुस्कुरा उठी हों। पर अचानक हँसी थम गई और बबलू ने धीरे से कहा—
“माँ कहती है, स्कूल बंद हो गया।
अब मैं पढ़ने नहीं, काम करने जाऊँगा।
ईंट उठानी होगी…”
मास्टर के हाथ से चाक फिसलकर जमीन पर गिर गई, उनकी आँखें एक पल को खाली हो गईं—बिलकुल उस श्यामपट्ट की तरह जो बच्चों के बिना सिर्फ़ काला पत्थर था। कुछ देर तक दोनों चुप रहे, फिर मास्टर ने चाक उठाई और बोर्ड पर “राम” और “सीता” के नीचे एक लंबी सी सीधी रेखा खींच दी।
बबलू ने पूछा—
“ये खाली रेखा क्यों है, मास्टर जी?”
रामदयाल मास्टर साहब के चेहरे पर थकान, दर्द और आशा का मिश्रण था। उन्होंने उसकी ओर देखते हुए कहा—
“क्योंकि आगे की कहानी, तुम्हें लिखनी है।”
बबलू ने धीरे से सिर हिलाया—जैसे उसने कुछ गहरा समझ लिया हो, जिसे शब्दों में कहना मुश्किल हो। वह मुड़ा, दरवाज़े पर पहुँचा, फिर पलटकर बोला—
“मैं कल फिर आऊँगा, मास्टर जी।”
दरवाज़ा बंद हुआ और कमरे में धूप की आख़िरी किरण बोर्ड पर लिखे ‘राम’ पर ठहर गई। मास्टर साहब ने एक गहरी साँस ली, घंटी को छूकर प्रार्थना की और धीरे से बुदबुदाए—
“अब भी उम्मीद है…”
और पहली बार, काफ़ी समय बाद श्यामपट्ट खाली नहीं था।
अगली सुबह गाँव जागा तो धूप की हल्की किरणें उगते सूरज के साथ खेतों पर फैल रही थीं। बैलगाड़ी का चरमराता पहिया, गाय की घंटियों का स्वर और कुएँ पर मटकों की टकराहट — यह वही पुराना गाँव था,पर कहीं–न–कहीं हवा बदली थी।
बबलू अपनी छोटी झोपड़ी के बाहर बैठा पुराने जूते की फटी हुई पट्टी बाँध रहा था। उसकी माँ मिट्टी के चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी और धुएँ की लकीर सुबह की धूप में ऐसे उठ रही थी जैसे कोई अधूरी दुआ आसमान तक जा रही हो।
माँ बोली—
“आज तुझे ईंट भट्ठे पर जल्दी पहुँचना है।
मालिक कह रहा था, काम में तेजी चाहिए।”
बबलू ने हिचकिचाकर कहा—
“माँ… मैं कल मास्टर जी के पास गया था।”
माँ ने हाथ रोका नहीं, पर आँखों की नमी राख में छिप गई थी।
“बबलू… पढ़ाई पेट नहीं भरती।
तू रायता मत फैला। काम से पैसे मिलते हैं—
पैसा न हो, तो कोई नाम याद नहीं रखता।”
बबलू धीरे से बोला—
“माँ, नाम लिखना सीख गया हूँ।”
माँ ने पहली बार उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में कुछ पल के लिए गर्व की चमक उभरी— फिर बुझ गई।
“नाम लिखने से तू रोटी खाएगा?”
बबलू चुप हो गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि रोटी भारी है या अक्षर। उसी समय गली से मोटरसाइकिल की आवाज़ आई। शफी था — धूल भरी जींस, चमकता हेलमेट,
और आँखों में शहर की तेज़ी। उसने बबलू को देखा और हँसकर बोला—
“क्यों छोटे मास्टर, आज फिर पढ़ाई?”
बबलू ने संकोच से मुस्कुराया—
“हाँ, मास्टर जी ने कहा है— कहानी तुम्हें लिखनी है।”
शफी कुछ पल चुप रहा, फिर उसने बबलू के सिर पर हाथ रखा—
“अच्छा है… पर ध्यान रखना, जिंदगी किताबों से नहीं चलती.......यहाँ पेट से चलती है।”
माँ ने सिर हिलाया जैसे शफी उसकी बात की मुहर लगा रहा हो। शफी मास्टर के पास गया। मास्टर श्यामपट्ट साफ़ कर रहे थे जैसे किसी मंदिर की मूर्ति पर चढ़ी धूल हटाते हों। शफी बोला—
“मास्टर जी, आप समझ क्यों नहीं रहे? गाँव में अब स्कूल की जरूरत नहीं,....लोग काम चाहते हैं, अक्षर नहीं।”
मास्टर ने पलटकर देखा और कहा—
“शफी, अक्षरों की कमी नहीं है। कमी है उस ज़िंदगी की, जो शब्दों में अर्थ ढूँढ सके।”
शफी हँस पड़ा—
“अर्थ का क्या करेंगे लोग? उन्हें तो बस कमाई चाहिए।”
मास्टर शांत स्वर में बोले—
“कमाई आदमी को ज़िंदा रखती है। पर अर्थ उसे इंसान बनाए रखता है।”
शफी कुछ कहना ही चाहता था कि तभी कमरे में बबलू दाख़िल हुआ— साँस फूलती, कपड़े मिट्टी से भरे, पर चेहरे पर एक चमक। उसने मास्टर के सामने खड़े होकर कहा—
“मुझे ‘आदमी’ लिखना है।”
मास्टर की आँखें भीग गईं। उन्होंने चाक उठाई और धीरे–धीरे लिखा—
आदमी
फिर बोले—
“यह किसी का नाम नहीं— यह एक मंज़िल है।”
बबलू ने बोर्ड को ऐसे देखा जैसे उसने पहली बार सूरज देखा हो। कमरे में हल्की हवा चली, खिड़की के टूटे काँच से आती रोशनी बोर्ड पर चमकती रही। शफी एक कोने में खड़ा सब देख रहा था—उसकी आँखों में कई साल पुराने दिन लौट आए, जब वह भी पहली बार ऐसे ही अक्षर देखकर रोया था — खुशी से। वह दरवाज़े तक गया, रुक गया, और पलटकर धीरे से बोला—
“मास्टर जी…
अगर मैं भी दोबारा लिखना चाहूँ, तो देर तो नहीं हुई?”
कमरा चुप हो गया। धीरे से मास्टर ने कहा—
“अक्षर कभी देर नहीं करते, शफी।
देर हम करते हैं।”
बाहर हल्की हवा चली, गिलहरी दौड़कर बोर्ड की ओर गई। किसी टूटी बेंच पर धूप का एक पैबंद चमक रहा था। ऐसा लगा जैसे कमरा सालों बाद पहली बार साँस ले रहा हो। और उसी पल गली के किसी मोड़ से सायरन की आवाज़ उभरी— फैक्ट्री की कॉल की आवाज़। बबलू का चेहरा उतर गया, उसने धीमे से कहा—
“मास्टर जी…
मालिक बुला रहा है।”
मास्टर ने उसकी आँखों में देखा—वहाँ पहली बार डर और साहस दोनों थे।
“जाओ, पर आज का अक्षर याद रखना।”
बबलू ने सर हिलाया, मुट्ठी बाँधी और दौड़ पड़ा। दरवाज़ा बंद हुआ और कमरे में एक भारी सन्नाटा उतर आया। मास्टर ने श्यामपट्ट की ओर देखा— बोर्ड पर बड़ा, चमकदार शब्द खड़ा था—
आदमी
वे धीरे से बुदबुदाए—
“यही लड़ाई है…”
सूरज ढलने लगा था, आसमान में फैली नारंगी रोशनी ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने शाम के आँचल में आग छिपा दी हो। गाँव की गली में धूल उठ रही थी, लोग अपने-अपने घर लौट रहे थे और दूर फैक्ट्री का सायरन एक घायल जानवर की चीख की तरह पूरा माहौल चीर रहा था। बबलू दौड़ते हुए फैक्ट्री पहुँचा, भट्ठे के पास कोयले की बदबू दम घोंट रही थी। म की कतार लगी थी — सबके चेहरों पर पसीना, धुआँ और थकान थी। मालिक की कड़क आवाज़ गूँजी—
“आज काम कम नहीं होना चाहिए।
जिसने देर की, उसे पैसे कटेंगे।”
बबलू घबरा गया, उसके हाथ काँप रहे थे। वह पहली बार वहाँ था, उसने ईंट उठाई— गर्म, भारी, और उसके छोटे हाथों के लिए बहुत ज़्यादा और जैसे ही उसने दूसरी ईंट उठाई, उसकी त्वचा जल गई। वह चीख पड़ा—
“आह!”
आसपास के मजदूरों ने नज़रें नहीं उठाईं, यह आवाज़ उनके लिए नई नहीं थी— वे ऐसे चीखों से बहरा हो चुके थे। एक बूढ़ा मजदूर आगे आया, उसने बबलू को पकड़ा और बोला—
“रो मत, बच्चा।
यहाँ आँसू पोंछने का समय नहीं मिलता।”
बबलू की आँखें भर आईं—उसे याद आया:
“मास्टर जी ने कहा था — आदमी बनना।”
उसने दाँत भींचे, ओठों को काटा, और फिर ईंट उठाई। पसीना, धुआँ, धड़कन — सब घुलते गए।
शाम होने लगी थी। बबलू बैठ नहीं पा रहा था, पर वह किसी को यह दिखाना नहीं चाहता था कि वह टूट रहा है। उसने गहरी साँस ली और मिट्टी पर अपनी उँगली से लिखा—
“आ…”
पर पूरा शब्द नहीं लिख पाया— सांस थम गई। उस रात मजदूरों को कम मजदूरी मिली। किसी ने विरोध नहीं किया। बबलू अँधेरी गली से वापस लौट रहा था — हाथ जल चुके थे, सांस पत्थर जैसी भारी लग रही थी। उधर मास्टर रामदयाल स्कूल में बैठे थे, उन्होंने मोमबत्ती जलाई थी। कमरा सुनसान था, और खिड़की से आती रात की हवा खड़िया की गंध को इधर–उधर बहा रही थी। वे अकेले बोर्ड के सामने खड़े थे— उस पर अभी भी लिखा था—
आदमी
उन्हें लगा जैसे यह शब्द किसी अदालत का फैसला बन गया हो। उन्होंने धीरे से कहा—
“शायद मैं गलत हूँ।
शायद अक्षर सच में रोटी से छोटे हैं।”
उनकी आवाज़ काँप रही थी। सालों बाद पहली बार उनके भीतर उम्मीद का दीपक काँपने लगा। उन्होंने बोर्ड को छूते हुए पूछा—
“क्या सच में तुम भूख से छोटे हो?”
कोई आवाज़ नहीं आई, बस मोमबत्ती की लौ झिलमिला उठी। तभी दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई। उन्होंने मुड़कर देखा— बबलू था, चेहरा काला पड़ा था, हाथ पट्टी से लिपटे थे और आँखों में मौत जैसा सन्नाटा। मास्टर आगे दौड़े—
“क्या हुआ?
बबलू, बोलो!”
बबलू फुसफुसाया—
“जला… पर लिखना नहीं छोड़ा…”
उसने काँपते हाथ से चाक उठाई— और बोर्ड पर बड़ी मुश्किल से लिखा—
“आ”
फिर गिर पड़ा। मास्टर उसे बाँहों में भरकर आँसू रोक नहीं पाए।
“तूने पूरा शब्द क्यों नहीं लिखा?”
बबलू बहुत धीमे बोला—
“बाक़ी… कल लिखूँगा…”
और उसकी आँखें बंद हो गईं —थकान से, दर्द से या शायद सपनों से। उस रात मास्टर ने पहली बार बोर्ड पर कुछ नहीं लिखा। उन्होंने बस चाक को मेज पर रखा और मोमबत्ती बुझा दी। अंधेरे में उन्होंने कहा—
“अगर बच्चों को रोटी के लिए जलना पड़े,
तो शिक्षा की रोशनी क्या जीतेगी?”
बाहर फैक्ट्री की चिमनी आसमान को सुर्ख कर रही थी, धुआँ ऊपर उठ रहा था — जैसे प्रार्थना नहीं, किसी आत्मा की चीख हो और दूर कहीं किसी टूटती ईंट की आवाज़ लंबे समय तक गूँजती रही।
